नमाज़ - हज़रत ईमाम हसन अलैहिसलाम

     
जुमा के दिन, अमीरल मोमिनीन की नमाज़ की तरह यह भी चार रक्'अत नमाज़ है, नीज़ इमाम हसन (अ:स) की एक चार रक्'अति नमाज़ भी है जिसकी हर रक्'अत में हम्द के बाद पच्चीस (25) मर्तबा सुरः तौहीद की तिलावत करें, और सलाम फेरने के बाद यह दुआ पढ़ें    
     
     

अल्ल्लाहुमा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

अल्लाहुम्मा इन्नी अता क़र-रुबो इलैका बे जूदिका व करमिका व अता-क़र'रुबो इलैका बे मोहम्मदीन अब्दिका व रसूलिका व अता'क़र'रबो इलैका बे'मला-इकतल मुक़र-रबीन व अम्बिया'इका व रसूलिका अन तो सल्ली अला मोहम्मदीन अदबेका व रसूलिका व अला आली मोहम्मदीन व अन तू/कीलनी अशरती व तस्तुरा आल्या ज़ुनुबी व तग्फ़िर'हां ली व तक़'ज़िया ली हवा'इजी व ला तू'अद-दिबानी बे क़बीहीन काना मिन्नी फ इन्ना अफ़्वका व जूदाका यसा उनी इन्नका अला कुल्ले शै'इन क़दीर, अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

 

اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَتَقَرَّبُ إِلَیْکَ بِجُودِکَ وَکَرَمِکَ وَأَتَقَرَّبُ إِلَیْکَ بِمُحَمَّدٍ عَبْدِکَ وَرَسُولِکَ وَأَتَقَرَّبُ إِلَیْکَ بِمَلاَئِکَتِکَ الْمُقَرَّبِینَ وَأَ نْبِیائِکَ وَرُسُلِکَ، أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ عَبْدِکَ وَرَسُولِکَ وَعَلَی آلِ مُحَمَّدٍ، وَأَنْ تُقِیلَنِی عَثْرَتِی، وَتَسْتُرَ عَلَیَّ ذُ نُوبِی وَتَغْفِرَھَا لِی،وَتَقْضِیَ لِی حَوَائِجِی،وَلاَ تُعَذِّبْنِی بِقَبِیحٍ کَانَ مِنِّی، فَإِنَّ عَفْوَکَ وَجُودَکَ یَسَعُنِی، إِنَّکَ عَلی کُلِّ شَیْءٍ قَدِیرٌ

 

 

अल्ल्लाहुमा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

ऐ माबूद मैं तेरे जूदो करम के जरिया तेरा तकर-रुब चाहता हूँ और मैं तेरे बन्दे और रसूल मोहम्मद (स:अ:व:व) के ज़रिये तुझ से  तकर-रुब चाहता हूँ और मैं तेरे मुक़ररिब मलाएका और तेरे नबियों और रसूलों के ज़रिये तेरा तकर-रुब चाहता हूँ! ऐ अल्लाह ! तू अपने बन्दे और रसूल हज़रात मोहम्मद और आले मोहम्मद पर रहमत नाजिल फरमा, और मेरी खता माफ़ फरमा दे, मेरे गुनाहों पर पर्दा डाल और इन्हें माफ़ कर दे, मरी हाजत पूरी फरमा और जो बुरी हरकत मुझ से हुई है इस पर मुझे अज़ाब न कर! बेशक तेरा अफ़ु और तेरा जूद मेरे शामिले हाल है, यक़ीनन तू हर चीज़ पर क़ादिर है

 

 

        

          

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