नमाज़ - इमाम मुसा अल-काज़िम अलैहिसलाम

यह दो रक्'अत नमाज़ है जिसकी हर रक्'अत में एक मर्तबा सुराः हम्द और बारह (12) मर्तबा सुरह तौहीद पढ़ें - नमाज़ के बाद हज़रात (अ:स) की यह दुआ पढ़ें

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

इलाही खशा-अतिल अस्वातु लका व ज़ल्लातिल अहलामु फ़ीका व वजिला कुल्लो शै'इन मिनका व हरबा कुल्लो शै'इन इलैका व ज़ा'क़तील अश्या'उ दूनाका व मला-अ कुल्लो शै'इन नूरुका फ़'अंतर रफ़ी'उ फ़ी जलालिका व अंतल बहिय्यु फी जमालिका व अंतल अज़ीमु फ़ी क़ुद'रतिका व अंतल लज़ी ला या उदूका शै-उन या मुन्ज़िला निआमति या मुफर'रिजा क़ुर्बती व या क़ाज़िया हां'जती आ'तिनि मास'अलाती बी ला इलाहा इल्ला अन्ता आमन्तु बिका मुखलिसन लका दीनी अस्बह्तु अला अहदिका व वादिका मस'तत'अतु अबू-उ लका बिन निआमति व अस्तग'फिरुका मीनज़-ज़ुनूबिल लाती ला यग्फेरोहा या मन हुवा फी उलुविही दा'ईन व फी ज़ुनू'विही आलीन व फी इशरा'क़िहि मुनीरून व फी सुल्तानिही क़वियुन सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

 

إِلھِی خَشَعَتِ الْاَصْوَاتُ لَکَ، وَضَلَّتِ الْاَحْلاَمُ فِیکَ، وَوَجِلَ کُلُّ شَیْءٍ مِنْکَ، وَھَرَبَ کُلُّ  شَیْءٍ إِلَیْکَ، وَضَاقَتِ الْاَشْیَاءُ دُونَکَ، وَمَلاَ کُلَّ شَیْءٍ نُورُکَ، فَأَنْتَ الرَّفِیعُ فِی جَلاَلِکَ،وَأَ نْتَ الْبَھِیُّ فِی جَمَالِکَ ، وَأَ نْتَ الْعَظِیمُ فِی قُدْرَتِکَ، وَأَ نْتَ الَّذِی لاَ یَؤُودُکَ شَیْءٌ یَا مُنْزِلَ نِعْمَتِی، یَا مُفَرِّجَ کُرْبَتِی، وَیَا قَاضِیَ حَاجَتِی،أَعْطِنِی مَسْأَلَتِی بِلاَ إِلٰہَ إِلاَّ أَ نْتَ، آمَنْتُ بِکَ  مُخْلِصاً لَکَ دِینِی، أَصْبَحْتُ عَلَی عَھْدِکَ وَوَعْدِکَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَبُوءُ لَکَ بِالنِّعْمَةِ،وَأَسْتَغْفِرُکَ مِنَ الذُّنُوبِ الَّتِی لاَ یَغْفِرُہا غَیْرُکَ، یَا مَنْ ھُوَ فِی عُلُوِّھِ دَانٍ، وَفِی دُنُوِّھِ عَالٍ،وَفِی إِشْرَاقِہِ مُنِیرٌ، وَفِی سُلْطَانِہِ قَوِیٌّ، صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِہِ۔

 

 

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम 

ऐ माबूद! तेरी बारगाह में आवाजें लरज़ जाती हैं और तेरे हुज़ूर में तसव्वुरात गुम हो जाते हैं! हर चीज़ तुझ से खौफ खाती है और हर चीज़ तेरी तरफ दौड़ रही है तमाम अशिया तेरे सामने हेच हैं और तेरे नूर ने हर चीज़ को घेर लिया है, बस तू अपने जलाल में बुल्न्द्तर है और तू अपने जमाल में रौशंनतर है, तू अपनी कुदरत में बुज़ूर्ग्तर है और तू हो वोह है जिसे कोई चीज़ थकाती नहीं, ऐ मुझ पर नेमत नाजिल करने वाले ऐ मेरे दुख दूर करने वाले और ऐ मेरी हाजत बर लाने वाले मेरी ख्वाहिश पूरी करदे के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं मैं तुझ पर ईमान लाया हूँ तेरे दीं में मुखलिस हूँ मैंने तेरे अहद व पैमान पर क़ायेम रहते हुए सुबह की है , अपनी हद तक तेरी नेमतें समेत रहा हूँ, मैं अपने गुनाहों पर तुझ से बख्श्सिश का तलबगार हूँ जिनको सिवाए तेरे कोई माफ़ नहीं कर सकता, ऐ वो जो अपनी बुलंदी में नज़दीक और नजदीकी में बुलंद है और रौशनी में मुनव्वर करने वाला है और सल्तनत में क़वी है, मोहम्मद (स:आ:वव) और आले मोहम्मद (अ:स) पर रहमत नाजिल फरमा 

 

        

          

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